श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 8: सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  2.8.59 
काष्ठा निमेषा दश पञ्च चैव
त्रिंशच्च काष्ठा गणयेत्कलां च।
त्रिंशत्कलश्चैव भवेन्मुहूर्त-
स्तैस्त्रिंशता रात्र्यहनी समेते॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
पंद्रह निमेषकों से एक काष्ठा बनती है और तीस काष्ठों से एक कला बनती है। तीस कलाओं से एक मुहूर्त बनता है और तीस मुहूर्तों से पूरा दिन और रात बनता है।॥ 59॥
 
Fifteen nimeshkas make one kashtha and thirty kashthas make one kala. Thirty kalas make one muhurta and thirty muhurtas make a complete day and night.॥ 59॥
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