श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 8: सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  2.8.55 
वैष्णवोंऽश: पर: सूर्यो योऽन्तर्ज्योतिरसम्प्लवम्।
अभिधायक ॐकारस्तस्य तत्प्रेरक: पर:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
सूर्य भगवान विष्णु का परम श्रेष्ठ अंश है और अपरिवर्तनशील अन्तर्यामी ज्योति का स्वरूप है। ओंकार उनका प्रतीक है और यही उन्हें उन दैत्यों का संहार करने में महान प्रेरणा देता है ॥ 55॥
 
The Sun is the most superior part of Lord Vishnu and is the form of the unchangeable internal light. Omkar is his symbol and it inspires him greatly in killing those demons. ॥ 55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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