श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 8: सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन  »  श्लोक 51-52
 
 
श्लोक  2.8.51-52 
तत: सूर्यस्य तैर्युद्धं भवत्यत्यन्तदारुणम्।
ततो द्विजोत्तमास्तोयं संक्षिपन्ति महामुने॥ ५१॥
ॐकारब्रह्मसंयुक्तं गायत्र्या चाभिमन्त्रितम्।
तेन दह्यन्ति ते पापा वज्रीभूतेन वारिणा॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
इसलिए सायंकाल के समय उनका सूर्य के साथ बड़ा भयंकर युद्ध होता है; हे मुनि! उस समय द्विजोत्तम पुरुषों द्वारा ओंकाररूपी ब्रह्मा तथा गायत्री द्वारा अभिमंत्रित जल से छोड़े गए वज्ररूपी जल से वे दुष्ट राक्षस भस्म हो जाते हैं॥51-52॥
 
Therefore, in the evening they have a very fierce battle with the Sun; Oh great sage! At that time, those evil demons get burnt by the water in the form of Vajra, which is released by the Dwijottam people in the form of Brahma in the form of Omkar and the water blessed by Gayatri. 51-52॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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