vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री विष्णु पुराण
»
अंश 2: द्वितीय अंश
»
अध्याय 8: सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन
»
श्लोक 32
श्लोक
2.8.32
कुलालचक्रपर्यन्तो यथा शीघ्रं प्रवर्त्तते।
दक्षिणप्रक्रमे सूर्यस्तथा शीघ्रं प्रवर्तते॥ ३२॥
अनुवाद
जैसे कुम्हार के चाक की नोक पर बैठा हुआ प्राणी बहुत तेजी से घूमता है, वैसे ही सूर्य भी दक्षिणायन को पार करने में बहुत तेजी से चलता है ॥ 32॥
Just as a creature situated on the tip of a Potter's wheel rotates very quickly, so too the Sun moves very quickly in crossing the Dakshinayan. ॥ 32॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×