| श्री विष्णु पुराण » अंश 2: द्वितीय अंश » अध्याय 8: सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन » श्लोक 30-31 |
|
| | | | श्लोक 2.8.30-31  | ततो रात्रि: क्षयं याति वर्द्धतेऽनुदिनं दिनम्॥ ३०॥
ततश्च मिथुनस्यान्ते परां काष्ठामुपागत:।
राशिं कर्कटकं प्राप्य कुरुते दक्षिणायनम्॥ ३१॥ | | | | | | अनुवाद | | तत्पश्चात् दिन-प्रतिदिन रात्रि क्षीण होने लगती है और दिन बढ़ने लगता है। फिर [मेष और वृषभ को पार करके] मिथुन राशि से निकलकर उत्तरायण की अंतिम सीमा पर स्थित होकर कर्क राशि में पहुँचकर दक्षिणायन प्रारंभ करता है॥30-31॥ | | | | Thereafter the night starts diminishing day by day and the day starts increasing. Then [crossing Aries and Taurus] emerging from Gemini, being present at the last boundary of Uttarayan, it reaches Cancer and starts Dakshinayan.॥ 30-31॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|