श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 8: सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.8.27 
कुलालचक्रपर्यन्तो भ्रमन्नेष दिवाकर:।
करोत्यहस्तथा रात्रिं विमुञ्चन्मेदिनीं द्विज॥ २७॥
 
 
अनुवाद
हे द्विज पुरुष! कुम्हार के चाक की नोक पर जीव की भाँति घूमते हुए यह सूर्य पृथ्वी के तीस भागों को पार करने में एक दिन और रात लगाता है।॥ 27॥
 
O twice born person, moving like a living being on the tip of a potter's wheel, this Sun takes one day and night in crossing all the thirty parts of the Earth.॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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