श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 8: सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.8.15 
नैवास्तमनमर्कस्य नोदय: सर्वदा सत:।
उदयास्तमनाख्यं हि दर्शनादर्शनं रवे:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जो सूर्यदेव सदैव एक ही रूप में रहते हैं, वे न तो उदय होते हैं, न अस्त; उनका देखना और न देखना ही उनका उदय और अस्त है ॥15॥
 
The Sun God who is always in the same form neither rises nor sets; indeed, His seeing and not seeing are His rising and setting. ॥15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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