| श्री विष्णु पुराण » अंश 2: द्वितीय अंश » अध्याय 8: सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन » श्लोक 13-14 |
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| | | | श्लोक 2.8.13-14  | उदयास्तमने चैव सर्वकालं तु सम्मुखे।
विदिशासु त्वशेषासु तथा ब्रह्मन् दिशासु च॥ १३॥
यैर्यत्र दृश्यते भास्वान्स तेषामुदय: स्मृत:।
तिरोभावं च यत्रैति तत्रैवास्तमनं रवे:॥ १४॥ | | | | | | अनुवाद | | इसी प्रकार सूर्योदय और सूर्यास्त भी सदैव विपरीत ही होते हैं। हे ब्रह्मन्! समस्त दिशाओं और अन्तरदिशाओं में जहाँ-जहाँ लोग सूर्य को देखते हैं, उनके लिए वह उदय होता है और जहाँ-जहाँ दिन के अंत में सूर्य लुप्त हो जाता है, वहीं उसका अस्त होना कहा जाता है।॥13-14॥ | | | | Similarly, the sunrise and sunset also always occur opposite to each other. O Brahman! In all the directions and sub-directions, wherever people see the Sun [at the end of the night], for them it rises there and wherever the Sun disappears at the end of the day, that is said to be its setting.॥ 13-14॥ | | ✨ ai-generated | | |
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