श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 8: सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन  »  श्लोक 110-112
 
 
श्लोक  2.8.110-112 
तत: सप्तर्षयो यस्या: प्राणायामपरायणा:।
तिष्ठन्ति वीचिमालाभिरुह्यमानजटा जले॥ ११०॥
वार्योघै: सन्ततैर्यस्या: प्लावितं शशिमण्डलम्।
भूयोऽधि कतरां कान्तिं वहत्येत दुह क्षये॥ १११॥
मेरुपृष्ठे पतत्युच्चैर्निष्क्रान्ता शशिमण्डलात्।
जगत: पावनार्थाय प्रयाति च चतुर्दिशम्॥ ११२॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर जिनके जल में खड़े होकर सप्तर्षि प्राणायाम में तत्पर होकर अघमर्षण मन्त्र का जप करते हुए उनकी तरंगों से कम्पित होते हैं और जिनके विशाल जल में चन्द्रमण्डल विसर्जित होकर पुनः पहले से भी अधिक चमक प्राप्त कर लेता है, वे श्रीगंगाजी चन्द्रलोक से निकलकर मेरु पर्वत पर गिरती हैं और उसे पवित्र करने के लिए चारों दिशाओं में जाती हैं ॥110-112॥
 
Thereafter, standing in whose waters the seven sages devoted to Pranayama, chanting the Aghamarshan mantra, vibrating with their waves, and in whose vast body of water the moon sphere, after dissipating, once again acquires more radiance than before, that Shri Gangaji emerges from the moon world and falls on Mount Meru and goes in all four directions to purify it. 110-112॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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