श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 8: सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन  »  श्लोक 104-105
 
 
श्लोक  2.8.104-105 
यस्मिन्प्रतिष्ठितो भास्वान‍्मेढीभूत: स्वयं ध्रुव:।
ध्रुवे च सर्वज्योतींषि ज्योति: ष्वम्भोमुचो द्विज॥ १०४॥
मेघेषु सङ्गता वृष्टिर्वृष्टे: सृष्टेश्च पोषणम्।
आप्यायनं च सर्वेषां देवादीनां महामुने॥ १०५॥
 
 
अनुवाद
हे द्विज! उसी विष्णुपद में सबके आधार परम तेजस्वी ध्रुवजी स्थित हैं और ध्रुवजी में ही समस्त नक्षत्र, नक्षत्रों में मेघ और मेघों में होने वाली वर्षा अवलंबित है। हे मुनि! उसी वर्षा से सम्पूर्ण सृष्टि का पालन होता है और समस्त देवता और मनुष्य पोषित होते हैं। 104-105॥
 
Hey Dwija! It is in that Vishnupad that the supremely brilliant Dhruv, the foundation of all, is situated, and in Dhruvji all the constellations, the clouds in the constellations and the rain in the clouds are dependent. Oh great sage! It is through that rain that the entire creation is nourished and all the gods and human beings are nourished. 104-105॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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