श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 6: भिन्न-भिन्न नरकोंका तथा भगवन्नामके माहात्म्यका वर्णन  »  श्लोक 50-51
 
 
श्लोक  2.6.50-51 
ज्ञानमेव परं ब्रह्म ज्ञानं बन्धाय चेष्यते।
ज्ञानात्मकमिदं विश्वं न ज्ञानाद्विद्यते परम्॥ ५०॥
विद्याविद्येति मैत्रेय ज्ञानमेवोपधारय॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
[परमार्थ में] ज्ञान ही परब्रह्म है और [अज्ञान की उपाधि से] वह बंधन का कारण है। यह सम्पूर्ण जगत् ज्ञान से परिपूर्ण है; ज्ञान के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। हे मैत्रेय! ज्ञान और अज्ञान को ज्ञान ही समझो। ॥50-51॥
 
[In the ultimate sense] knowledge is the Supreme Brahman and [with the title of ignorance] it is the cause of bondage. This entire universe is full of knowledge; there is nothing other than knowledge. O Maitreya! Consider knowledge and ignorance as knowledge only. ॥ 50-51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)