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श्लोक 2.4.63  |
शाकस्तत्र महावृक्ष: सिद्धगन्धर्वसेवित:।
यत्रत्यवातसंस्पर्शादाह्लादो जायते पर:॥ ६३॥ |
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| अनुवाद |
| वहाँ सिद्धों और गन्धर्वों द्वारा सेवित एक बहुत ही महान् शाक वृक्ष है, जिसकी वायु का स्पर्श करने से हृदय में अपार आनन्द उत्पन्न होता है ॥63॥ |
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| There is a very great vegetable tree served by Siddhas and Gandharvas, touching whose air creates immense joy in the heart. 63॥ |
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