श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 4: प्लक्ष तथा शाल्मल आदि द्वीपोंका विशेष वर्णन  »  श्लोक 50-51
 
 
श्लोक  2.4.50-51 
क्रौञ्चश्च वामनश्चैव तृतीयश्चान्धकारक:।
चतुर्थो रत्नशैलश्च स्वाहिनी हयसन्निभ:॥ ५०॥
दिवावृत्पञ्चमश्चात्र तथान्य: पुण्डरीकवान‍्।
दुन्दुभिश्च महाशैलो द्विगुणास्ते परस्परम्।
द्वीपा द्वीपेषु ये शैला यथा द्वीपेषु ते तथा॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
उनमें पहला क्रौंच, दूसरा वामन, तीसरा अन्धकारक, चौथा घोड़ी के मुख के समान रत्नजटित स्वाहिनी पर्वत, पाँचवाँ दिवावृत, छठा पुण्डरीकवन और सातवाँ महापर्वत दुन्दुभि है। ये द्वीप एक-दूसरे के दोहरे हैं; और उन्हीं के समान इनके पर्वत भी [क्रमशः दोहरे] हैं।॥50-51॥
 
The first among them is Krauncha, the second is Vamana, the third is Andhakaraka, the fourth is the jeweled Swahini mountain like the face of a mare, the fifth is Divavrit, the sixth is Pundarikavan and the seventh is the great mountain Dundubhi. These islands are double each other; and like them, their mountains are also [successively double].॥50-51॥
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