Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 vishnu 2.16.20-21: और वह समस्त प्राणियों को अपने से पृथक् देखने लगा - हे धर्मात्मा! हे पृथ्वी के स्वामी! जिस प्रकार उस धर्मात्मा ब्राह्मण ने परम मोक्ष प्राप्त किया, उसी प्रकार तुम भी आत्मा, शत्रु और मित्र के प्रति समभाव रखते हुए, अपने को ही सर्वस्व जानकर मोक्ष प्राप्त करो॥ 20-21॥ | vishnu अध्याय 2.16: ऋभुकी आज्ञासे निदाघका अपने घरको लौटना । vishnu अंश 2: द्वितीय अंश । श्री विष्णु पुराण Sri Vishnu Puran | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
सर्वभूतान्यभेदेन ददृशे स तदात्मन:।
यथा ब्रह्मपरो मुक्तिमवाप परमां द्विज:॥ २०॥
तथा त्वमपि धर्मज्ञ तुल्यात्मरिपुबान्धव:।
भव सर्वगतं जानन्नात्मानमवनीपते॥ २१॥
अनुवाद
और वह समस्त प्राणियों को अपने से पृथक् देखने लगा - हे धर्मात्मा! हे पृथ्वी के स्वामी! जिस प्रकार उस धर्मात्मा ब्राह्मण ने परम मोक्ष प्राप्त किया, उसी प्रकार तुम भी आत्मा, शत्रु और मित्र के प्रति समभाव रखते हुए, अपने को ही सर्वस्व जानकर मोक्ष प्राप्त करो॥ 20-21॥
And he started seeing all the living beings as separate from himself, O religious man! O Lord of the Earth! Just as that devout Brahmin attained supreme salvation, in the same way you too attain salvation by having equal feelings towards soul, enemy and friends, knowing yourself as everything. 20-21॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥