श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 15: ऋभुका निदाघको अद्वैतज्ञानोपदेश  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.15.31 
तदेतद्भवता ज्ञात्वा मृष्टामृष्टविचारि यत्।
तन्मनस्समतालम्बि कार्यं साम्यं हि मुक्तये॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
इसलिए ऐसा जानकर तू स्वाद और स्वाद का चिन्तन करने वाले इस मन को समभावयुक्त बना, क्योंकि मोक्ष का एकमात्र मार्ग समता ही है ॥31॥
 
Therefore, knowing this, you should make this mind that thinks about taste and taste equanimous, because the only way to salvation is equality. 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)