श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 14: जडभरत और सौवीरनरेशका संवाद  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  2.14.16 
श्रेयांस्येवमनेकानि शतशोऽथ सहस्रश:।
सन्त्यत्र परमार्थस्तु न त्वेते श्रूयतां च मे॥ १६॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार सैकड़ों-हजारों प्रकार के पुण्य हैं, परन्तु वे सब परम सत्य नहीं हैं। अब सुनो, परम सत्य क्या है -॥16॥
 
In this way there are hundreds and thousands of kinds of merits, but all of them are not the ultimate truth. Now listen to what is the ultimate truth -॥16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)