श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 13: भरत-चरित्र  »  श्लोक 96
 
 
श्लोक  2.13.96 
एवं छत्रशलाकानां पृथग्भावे विमृश्यताम्।
क्व यातं छत्रमित्येष न्यायस्त्वयि तथा मयि॥ ९६॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार छाते की तीलियों को अलग रखकर छाते का और उसके निवास स्थान का विचार करो। यही सिद्धांत तुम पर और मुझ पर भी लागू होता है [अर्थात् मेरा और तुम्हारा शरीर भी पंचभूतों के अतिरिक्त कुछ नहीं है] ॥96॥
 
Similarly, keeping aside the spokes of the umbrella, think about the umbrella and where it resides. The same principle applies to you and me [that is, my and your bodies are also nothing other than the five elements]. ॥96॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)