श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 13: भरत-चरित्र  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  2.13.9-10 
यज्ञेशाच्युत गोविन्द माधवानन्त केशव।
कृष्ण विष्णो हृषीकेश वासुदेव नमोऽस्तु ते॥ ९॥
इति राजाह भरतो हरेर्नामानि केवलम्।
नान्यज्जगाद मैत्रेय किञ्चित्स्वप्नान्तरेऽपि च।
एतत्पदं तदर्थं च विना नान्यदचिन्तयत्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
हे यज्ञेश! हे अच्युत! हे गोविन्द! हे माधव! हे अनन्त! हे केशव! हे कृष्ण! हे विष्णो! हे हृषीकेश! हे वासुदेव! आपको नमस्कार है।' - इस प्रकार राजा भरत निरन्तर भगवान् के नामों का ही जप करते थे। हे मैत्रेय! वे स्वप्न में भी इस श्लोक के अतिरिक्त कुछ नहीं कहते थे और इसके अर्थ के अतिरिक्त कभी कुछ नहीं सोचते थे।॥ 9-10॥
 
O Yajnesh! O Achyuta! O Govinda! O Madhava! O Ananta! O Keshava! O Krishna! O Visno! O Hrishikesha! O Vasudeva! Salutations to you' - in this manner King Bharata used to continuously chant only the names of the Lord. O Maitreya! He never said anything other than this verse even in his dreams and never thought of anything other than its meaning.॥ 9-10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)