ब्राह्मण उवाच
शब्दोऽहमिति दोषाय नात्मन्येष तथैव तत्।
अनात्मन्यात्मविज्ञानं शब्दो वा भ्रान्तिलक्षण:॥ ८६॥
अनुवाद
ब्राह्मण बोला - हे राजन ! आपने जो कहा कि 'अहंकार' शब्द से आत्मा में कोई दोष नहीं होता, वह ठीक है, परंतु जो मायामय 'अहंकार' शब्द है, जो अनात्मा में आत्मा का ज्ञान कराता है, वही दोष का कारण है ॥86॥
The Brahmin said – O king! What you said that the word ‘ego’ does not cause any defect in the soul is right, but the illusory word ‘ego’ which gives knowledge of the self in the non-soul itself is the cause of the defect. 86॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥