श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 13: भरत-चरित्र  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  2.13.71 
आत्मा शुद्धोऽक्षर: शान्तो निर्गुण: प्रकृते: पर:।
प्रवृद्‍ध्यपचयौ नास्य एकस्याखिलजन्तुषु॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
आत्मा शुद्ध, पवित्र, शान्त, निर्गुण और प्रकृति से परे है तथा वह समस्त प्राणियों में विद्यमान है, इसलिए वह न कभी बढ़ता है, न कभी क्षय होता है ॥71॥
 
The soul is pure, pure, peaceful, without qualities and beyond nature and it is present in all living beings. Therefore it never grows or decays. 71॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)