स राजा शिबिकारूढो गन्तुं कृतमतिर्द्विज।
बभूवेक्षुमतीतीरे कपिलर्षेर्वराश्रमम्॥ ५३॥
श्रेय: किमत्र संसारे दु:खप्राये नृणामिति।
प्रष्टुं तं मोक्षधर्मज्ञं कपिलाख्यं महामुनिम्॥ ५४॥
अनुवाद
हे द्विज! उस सौवीरराज ने शिबिका पर चढ़कर इक्षुमती नदी के तट पर स्थित उन महर्षि के आश्रम में जाकर मोक्षधर्म के ज्ञाता महामुनि कपिल से यह पूछने का विचार किया कि ‘इस दुःखमय संसार में मनुष्यों का क्या श्रेय है?’ ॥53-54॥
Hey Dwija! That Sauveerraj thought of going to the ashram of that Maharishi on the banks of river Ikshumati by climbing on Shibika to ask the great sage Kapil, the expert of Mokshadharma, 'What is the credit of human beings in this sad world?' 53-54॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥