श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 13: भरत-चरित्र  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.13.5 
पुण्यदेशप्रभावेण ध्यायतश्च सदा हरिम्।
कथं तु नाऽभवन्मुक्तिर्यदभूत्स द्विज: पुन:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार पुण्य कर्मों के प्रभाव से तथा हरि (सम्पूर्ण लोकों के ईश्वर) के चिन्तन से भी उसे मुक्ति क्यों नहीं मिली, जिसके कारण उसे पुनः ब्राह्मण योनि में जन्म लेना पड़ा?॥5॥
 
In this manner why did he not get liberation even by the influence of the good deeds and thinking about Hari (the God of all worlds), due to which he had to take birth as a Brahmin again? ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)