श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 13: भरत-चरित्र  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  2.13.45 
भुङ्‍क्ते कुल्माषव्रीह्यादि शाकं वन्यं फलं कणान्।
यद्यदाप्नोति सुबहु तदत्ते कालसंयमम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
जौ, चावल, शाक, जंगली फल या अन्न आदि जो भी उन्हें खाने को मिलता, उसे भी वे थोड़ा-सा बहुत समझकर खा लेते और समय व्यतीत करते ॥45॥
 
Whatever they got as eatables such as barley, rice, vegetables, wild fruits or grains, they would eat that too, considering even a little as a lot and pass the time. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)