श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 13: भरत-चरित्र  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  2.13.43 
तस्माच्चरेत वै योगी सतां धर्ममदूषयन्।
जना यथावमन्येरन्गच्छेयुर्नैव सङ्गतिम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
अतः योगी को चाहिए कि वह सत्यमार्ग को दूषित न करे, अपितु ऐसा आचरण करे कि लोग उसका अनादर करें और उसे सत्संगति से दूर रखें ॥ 43॥
 
Therefore, a yogi should not pollute the right path but should behave in such a manner that people disrespect him and keep him away from good company. ॥ 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)