vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री विष्णु पुराण
»
अंश 2: द्वितीय अंश
»
अध्याय 13: भरत-चरित्र
»
श्लोक 40
श्लोक
2.13.40
उक्तोऽपि बहुश: किञ्चिज्जडवाक्यमभाषत।
तदप्यसंस्कारगुणं ग्राम्यवाक्योक्तिसंश्रितम्॥ ४०॥
अनुवाद
जब कोई उससे प्रश्न करता तो वह कुछ ऐसे शब्द बोल देता जो असंस्कृत, अर्थहीन तथा ग्रामीण वाक्यों से मिश्रित होते थे, जैसे वृक्ष।
When someone questioned him, he would utter some words which were uncultured, meaningless and mixed with rural sentences, like a tree. 40.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×