श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 13: भरत-चरित्र  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.13.32 
मृगमेव तदाद्राक्षीत्त्यजन्प्राणानसावपि।
तन्मयत्वेन मैत्रेय नान्यत्किञ्चिदचिन्तयत्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
हे मैत्रेय! प्राण त्यागते समय भी राजा स्नेहवश उस मृग को देखता रहा और उसी में मग्न होकर उसने अन्य किसी बात का ध्यान नहीं किया ॥32॥
 
O Maitreya, even while giving up his life, the king kept looking at the deer out of affection and being absorbed in it, he did not think of anything else. ॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)