श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 13: भरत-चरित्र  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  2.13.22 
तस्य तस्मिन्मृगे दूरसमीपपरिवर्तिनि।
आसीच्चेत: समासक्तं न ययावन्यतो द्विज॥ २२॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मण! इस प्रकार राजा का मन उस मृग में ही लगा रहता था जो कभी निकट और कभी दूर रहता था; अन्य विषयों की ओर वह कभी नहीं जाता था॥22॥
 
O Brahmin! In this way the king's mind remained absorbed in that deer which was sometimes near and sometimes far; it never went towards other subjects. ॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)