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श्लोक 2.12.47  |
यच्चैतद्भुवनगतं मया तवोक्तं
सर्वत्र व्रजति हि तत्र कर्मवश्य:।
ज्ञात्वैवं ध्रुवमचलं सदैकरूपं
तत्कुर्याद्विशति हि येन वासुदेवम्॥ ४७॥ |
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| अनुवाद |
| मैंने तुमसे जो तीनों लोकों का वर्णन किया है, जीव अपने कर्मों के कारण इनमें विचरण करता है, ऐसा जानकर मनुष्य को इससे विरक्त हो जाना चाहिए और वही करना चाहिए जिससे वह सनातन, अचल और सदा एकरूप भगवान वासुदेव में लीन हो जाए ॥47॥ |
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| What I have described to you about the three worlds, the living being roams in these due to his actions, knowing this, a person should become detached from it and should do only that by which he gets absorbed in the eternal, immovable and always united Lord Vasudev. 47॥ |
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| इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेंऽशे द्वादशोऽध्याय:॥ १२॥ |
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