श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 12: नवग्रहोंका वर्णन तथा लोकान्तरसम्बन्धी व्याख्यानका उपसंहार  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  2.12.42 
मही घटत्वं घटत: कपालिका
कपालिका चूर्णरजस्ततोऽणु:।
जनै: स्वकर्मस्तिमितात्मनिश्चयै-
रालक्ष्यते ब्रूहि किमत्र वस्तु॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
देखो, मिट्टी ही घड़ा बनती है, फिर घड़े से खोपड़ी बनती है, खोपड़ी से धूल बनती है और धूल से परमाणु बनते हैं। फिर बताओ, कर्मों के वशीभूत होकर अपने स्वरूप को भूले हुए मनुष्य इसमें कौन-सा सत्य देखते हैं? ॥42॥
 
See, the clay itself becomes a pot, and then from the pot it becomes a skull, from the skull it becomes dust and from dust it becomes atoms. Then tell me, what truth do men, who are under the influence of their deeds, forgetting their true nature, see in this? ॥ 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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