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श्लोक 2.12.27  |
तैलपीडा यथा चक्रं भ्रमन्तो भ्रामयन्ति वै।
तथा भ्रमन्ति ज्योतींषि वातविद्धानि सर्वश:॥ २७॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे तेली स्वयं घूमते हुए तेली कोल्हू को घुमाते रहते हैं, वैसे ही समस्त ग्रह वायु से आबद्ध होकर घूमते रहते हैं॥27॥ |
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| Just as the oilmen themselves keep rotating the oil-press while rotating, similarly all the planets keep rotating being bound by the air.॥ 27॥ |
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