श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 12: नवग्रहोंका वर्णन तथा लोकान्तरसम्बन्धी व्याख्यानका उपसंहार  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  2.12.14-15 
एवं देवान‍् सिते पक्षे कृष्णपक्षे तथा पितॄन्।
वीरुधश्चामृतमयै: शीतैरप्परमाणुभि:॥ १४॥
वीरुधौषधिनिष्पत्त्या मनुष्यपशुकीटकान्।
आप्याययति शीतांशु: प्राकाश्याह्लादनेन तु॥ १५॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार चन्द्रदेव शुक्ल पक्ष में देवताओं का और कृष्ण पक्ष में पितरों का पोषण करते हैं। वे अमृततुल्य शीतल जलबिन्दुओं से लताएँ, वृक्ष, लताएँ, औषधियाँ आदि उत्पन्न करके और उन्हें अपनी चाँदनी से प्रसन्न करके मनुष्य, पशु, कीट आदि सभी प्राणियों का पोषण करते हैं। ॥14-15॥
 
In this manner, the Moon-god nourishes the gods in the Shukla Paksha and the ancestors in the Krishna Paksha. By producing creepers, trees, creepers, medicinal herbs etc. from the nectar-like cool water drops and by delighting them with his moonlight, he nourishes all living beings including humans, animals, insects etc. ॥14-15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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