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श्लोक 2.11.26  |
पक्षतृप्तिं तु देवानां पितॄणां चैव मासिकीम्।
शश्वत्तृप्तिं च मर्त्यानां मैत्रेयार्क: प्रयच्छति॥ २६॥ |
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| अनुवाद |
| हे मैत्रेय! इस प्रकार सूर्यदेव देवताओं को पाक्षिक, पितरों को मासिक तथा मनुष्यों को प्रतिदिन तृप्त करते रहते हैं॥26॥ |
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| O Maitreya! In this way, Suryadev keeps satisfying the gods fortnightly, the ancestors monthly and the human beings daily. 26॥ |
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| इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेंऽशे एकादशोऽध्याय:॥ ११॥ |
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