श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 9: दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान‍्का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.9.22 
वसिष्ठाद्यैर्दयासारैस्स्तोत्रं कुर्वद्भिरुच्चकै:।
गर्वं गतोऽसि येनैवं मामप्यद्यावमन्यसे॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
दयालु वसिष्ठ आदि की अतिशय प्रशंसा से तुम इतने अभिमानी हो गये हो कि आज तुम मेरा भी अपमान करने का प्रयत्न कर रहे हो।
 
You have become so conceited by the excessive praise of the compassionate Vasishtha and others that today you are trying to insult me ​​also. 22.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)