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श्लोक 1.7.48  |
गुणत्रयमयं ह्येतद्ब्रह्मन् शक्तित्रयं महत्।
योऽतियाति स यात्येव परं नावर्त्तते पुन:॥ ४८॥ |
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| अनुवाद |
| हे ब्रह्मन्! ये तीनों महाशक्तियाँ त्रिगुणमयी हैं; अतः जो इन तीनों गुणों से परे हो जाता है, वह परमपद को प्राप्त होता है और जन्म-मरण के चक्र में नहीं फँसता ॥ 48॥ |
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| O Brahman! These three great powers are trigunamayi (three gunas); therefore, he who transcends these three gunas attains the supreme state and is no longer trapped in the cycle of birth and death. ॥ 48॥ |
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| इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे सप्तमोऽध्याय:॥ ७॥ |
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