श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 7: मरीचि आदि प्रजापतिगण, तामसिक सर्ग, स्वायम्भुवमनु और शतरूपा तथा उनकी सन्तानका वर्णन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  1.7.40 
श्रीपराशर उवाच
सर्गस्थितिविनाशांश्च भगवान‍्मधुसूदन:।
तैस्तै रूपैरचिन्त्यात्मा करोत्यव्याहतो विभु:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
श्री पराशरजी बोले - सर्वव्यापी सर्वव्यापी भगवान मधुसूदन, जिनकी गति कभी नहीं रुकती, वे मनु आदि रूपों के द्वारा निरन्तर जगत् की रचना, उत्पत्ति और संहार करते रहते हैं ॥40॥
 
Shri Parasharji said - The omnipresent omnipresent Lord Madhusudan, whose movement never stops, continuously creates, creates and destroys the world through these forms of Manu etc. 40॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd