श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 6: चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था, पृथिवी-विभाग और अन्नादिकी उत्पत्तिका वर्णन  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  1.6.37-38 
सप्तर्षीणां तु यत्स्थानं स्मृतं तद्वै वनौकसाम्।
प्राजापत्यं गृहस्थानां न्यासिनां ब्रह्मसंज्ञितम्॥ ३७ ॥
योगिनाममृतं स्थानं स्वात्मसन्तोषकारिणाम्॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार वनवासियों का स्थान सप्तर्षिलोक है, गृहस्थों का पितृलोक है और संन्यासियों का ब्रह्मलोक है। तथा आत्म-साक्षात्कार से संतुष्ट योगियों का स्थान अमरपद (मोक्ष) है। ॥37-38॥
 
Similarly, the place of forest dwellers is Saptarishiloka, for householders is Pitrulok and for sanyasis is Brahmaloka. And the place of Yogis satisfied with self-realization is Amarpad (salvation). ॥37-38॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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