श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 6: चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था, पृथिवी-विभाग और अन्नादिकी उत्पत्तिका वर्णन  »  श्लोक 32-33
 
 
श्लोक  1.6.32-33 
संसिद्धायां तु वार्तायां प्रजा: सृष्टा प्रजापति:।
मर्यादां स्थापयामास यथास्थानं यथागुणम्॥ ३२॥
वर्णानामाश्रमाणां च धर्मा न‍् धर्मभृतां वर।
लोकांश्च सर्ववर्णानां सम्यग्धर्मानुपालिनाम्॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
हे पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ मैत्रेय! इस प्रकार कृषि आदि जीविका के साधन निश्चित हो जाने पर प्रजापति ब्रह्माजी ने अपने-अपने स्थान और गुणों के अनुसार प्रजाओं की रचना की तथा अपने धर्म का भलीभाँति पालन करने वाले समस्त वर्णों की मर्यादा, वर्ण और आश्रमों का धर्म तथा संसार आदि की स्थापना की॥32-33॥
 
O Maitreya, the best among the virtuous! In this way, after the means of livelihood like agriculture etc. were fixed, Prajapati Brahmaji created the people according to their place and qualities and established the dignity, religion of varnas and ashrams and the world etc. of all the varnas who follow their dharma well. 32-33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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