श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 6: चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था, पृथिवी-विभाग और अन्नादिकी उत्पत्तिका वर्णन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.6.3 
श्रीपराशर उवाच
सत्याभिध्यायिन: पूर्वं सिसृक्षोर्ब्रह्मणो जगत्।
अजायन्त द्विजश्रेष्ठ सत्त्वोद्रिक्ता मुखात्प्रजा:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
श्री पराशरजी बोले - हे द्विजश्रेष्ठ! श्री ब्रह्माजी के मुख से सत्त्वप्रधान लोग सृष्टि की रचना करने की सच्ची इच्छा और संकल्प लेकर उत्पन्न हुए हैं॥3॥
 
Shri Parasharji said – O best of the two! Sattva-pradhaan people were born from the mouth of Shri Brahmaji with true resolve and desire to create the world. 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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