श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 6: चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था, पृथिवी-विभाग और अन्नादिकी उत्पत्तिका वर्णन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  1.6.29 
येषां तु कालसृष्टोऽसौ पापबिन्दुर्महामुने।
चेत:सु ववृधे चक्रुस्ते न यज्ञेषु मानसम्॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
हे महामुनि! काल की गति के कारण जिनके मन पाप के बीजों से भरे हुए हैं, वे ही यज्ञ में प्रवृत्त नहीं होते॥29॥
 
Oh great sage! Only those people whose minds are filled with the seeds of sin due to the speed of time are not inclined towards Yagya. 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)