श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 6: चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था, पृथिवी-विभाग और अन्नादिकी उत्पत्तिका वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.6.15 
अधर्मबीजसमुद्भूतं तमोलोभसमुद्भवम्।
प्रजासु तासु मैत्रेय रागादिकमसाधकम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे मैत्रेय! इससे मोह रूपी अधर्म का बीज उत्पन्न होता है, जो मानव-प्रयत्न का नाश करता है तथा अज्ञान और लोभ को जन्म देता है॥15॥
 
O Maitreya! Due to this, the seed of irreligion in the form of attachment, which destroys human endeavour and gives rise to ignorance and greed, is born. ॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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