| श्री विष्णु पुराण » अंश 1: प्रथम अंश » अध्याय 6: चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था, पृथिवी-विभाग और अन्नादिकी उत्पत्तिका वर्णन » श्लोक 14 |
|
| | | | श्लोक 1.6.14  | तत: कालात्मको योऽसौ स चांश: कथितो हरे:।
स पातयत्यघं घोरमल्पमल्पाल्पसारवत्॥ १४ ॥ | | | | | | अनुवाद | | तब (त्रेतायुग के प्रारम्भ में) भगवान् की वह अवस्था, जिसे हम पहले ही तुमसे कह चुके हैं, 'काल' कहलाती है, प्रजा से ऐसे पाप करवाती है जो बहुत ही अल्प (सुख) वाले, तुच्छ और घोर (दुःख) होते हैं।॥ 14॥ | | | | Then (at the beginning of the Treta-yuga), the phase of the Lord which we have already described to you called 'Kala' causes the subjects to commit sins which are of very little essence (of happiness), trivial and grave (of sorrow).॥ 14॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|