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श्री विष्णु पुराण
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अंश 1: प्रथम अंश
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अध्याय 5: अविद्यादि विविध सर्गोंका वर्णन
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श्लोक 55
श्लोक
1.5.55
सामानि जगतीछन्द: स्तोमं सप्तदशं तथा।
वैरूपमतिरात्रं च पश्चिमादसृजन्मुखात्॥ ५५॥
अनुवाद
पश्चिम दिशा की ओर से साम, जगतीचंड, सप्तदशस्तोम, वैरूप और अतिरात्र की रचना हुई। 55॥
West-facing side created Sama, Jagtichand, Saptadashastom, Vairup and Atiratra. 55॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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