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श्री विष्णु पुराण
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अंश 1: प्रथम अंश
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अध्याय 5: अविद्यादि विविध सर्गोंका वर्णन
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श्लोक 54
श्लोक
1.5.54
यजूंषि त्रैष्टुभं छन्द: स्तोमं पञ्चदशं तथा।
बृहत्साम तथोक्थं च दक्षिणादसृजन्मुखात्॥ ५४॥
अनुवाद
दक्षिणाभिमुख होकर उन्होंने यजु:, त्रैष्टुपण्ड:, पंचदशस्तोम:, बृहत्साम: और उक्ति की रचना की ॥54॥
From the south-facing side he composed Yaju, Treishtuphand, Panchadashstom, Brihatsam and Uktha. 54॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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