श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 5: अविद्यादि विविध सर्गोंका वर्णन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  1.5.27 
श्रीमैत्रेय उवाच
सङ्क्षेपात्कथित: सर्गो देवादीनां मुने त्वया।
विस्तराच्छ्रोतुमिच्छामि त्वत्तो मुनिवरोत्तम॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
श्री मैत्रेयजी बोले, "हे ऋषि! आपने इन देवताओं की रचनाओं का संक्षेप में वर्णन किया है। अब हे महामुनि! मैं आपके मुख से इन्हें विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ।"
 
Sri Maitreya said, "O sage! You have briefly described the creations of these gods. Now, O great sage! I want to hear them in detail from your mouth." 27.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)