श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 5: अविद्यादि विविध सर्गोंका वर्णन  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  1.5.25-26 
प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवम: स्मृत:।
इत्येते वै समाख्याता नव सर्गा: प्रजापते:॥ २५॥
प्राकृता वैकृताश्चैव जगतो मूलहेतव:।
सृजतो जगदीशस्य किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि॥ २६॥
 
 
अनुवाद
नौवाँ कौमार सर्ग है, जो प्राकृत और वैकृत दोनों है। इस प्रकार सृष्टि की रचना में तत्पर रहने वाले जगदीश्वर प्रजापति तुम्हें प्राकृत और वैकृत नामक ये मूल नौ सर्ग सुनाएँ। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? 25-26॥
 
The ninth is Kaumar Sarga which is both Prakrit and Vaikrit. In this way, let Jagadishwar Prajapati, who is involved in the creation of the universe, recite to you these basic nine cantos of the world called Prakrit and Vaikrit. What else do you want to hear now? 25-26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)