श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 5: अविद्यादि विविध सर्गोंका वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.5.14 
तुष्टात्मनस्तृतीयस्तु देवसर्गस्तु स स्मृत:।
तस्मिन्सर्गेऽभवत्प्रीतिर्निष्पन्ने ब्रह्मणस्तदा॥ १४॥
 
 
अनुवाद
इसे तीसरा देवसर्ग कहते हैं। इस स्कन्ध के प्रादुर्भाव से संतुष्टचित्त ब्रह्माजी अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥14॥
 
This is called the third Devsarga. The contented mind Brahmaji was very happy with the emergence of this canto. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)