श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 4: ब्रह्माजीकी उत्पत्ति वराहभगवान‍्द्वारा पृथिवीका उद्धार और ब्रह्माजीकी लोक-रचना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  1.4.50 
ब्रह्मरूपधरो देवस्ततोऽसौ रजसा वृत:।
चकार सृष्टिं भगवांश्चतुर्वक्त्रधरो हरि:॥ ५० ॥
 
 
अनुवाद
तब रजोगुण से युक्त भगवान हरि ने चतुर्मुख ब्रह्मा का रूप धारण करके जगत् की रचना की ॥50॥
 
Then Lord Hari, imbued with the Rajoguna, assumed the form of the four-faced Brahma and created the universe. ॥50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)