श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 4: ब्रह्माजीकी उत्पत्ति वराहभगवान‍्द्वारा पृथिवीका उद्धार और ब्रह्माजीकी लोक-रचना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  1.4.37 
द्यावापृथिव्योरतुलप्रभाव
यदन्तरं तद्वपुषा तवैव।
व्याप्तं जगद्‍व्याप्तिसमर्थदीप्ते
हिताय विश्वस्य विभो भव त्वम्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
हे अतुलित पराक्रमी प्रभु! पृथ्वी और आकाश का अन्तर आपके शरीर द्वारा फैलाया गया है। हे ब्रह्माण्ड में व्याप्त रहने वाले तेजोमय प्रभु! कृपया जगत का कल्याण करें॥ 37॥
 
O incomparably powerful Lord! The distance between the earth and the sky is spread by your body. O effulgent Lord capable of pervading the universe! Please bless the world.॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)