श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 4: ब्रह्माजीकी उत्पत्ति वराहभगवान‍्द्वारा पृथिवीका उद्धार और ब्रह्माजीकी लोक-रचना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  1.4.36 
दंष्ट्राग्रविन्यस्तमशेषमेतद्-
भूमण्डलं नाथ विभाव्यते ते।
विगाहत: पद्मवनं विलग्नं
सरोजिनीपत्रमिवोढपङ्कम्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! आपके जबड़े पर स्थित यह सम्पूर्ण जगत् ऐसा प्रतीत हो रहा है, मानो कमलवन को रौंदते समय राज हाथी के दांतों में कीचड़ से सना हुआ कमल का पत्ता फंस गया हो।
 
O Lord! This whole world resting on your jaws appears as if a lotus leaf smeared with mud has been stuck in the teeth of the king elephant while trampling the lotus grove.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)