श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 4: ब्रह्माजीकी उत्पत्ति वराहभगवान‍्द्वारा पृथिवीका उद्धार और ब्रह्माजीकी लोक-रचना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.4.16 
सम्भक्षयित्वा सकलं जगत्येकार्णवीकृते।
शेषे त्वमेव गोविन्द चिन्त्यमानो मनीषिभि:॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
और जब संसार नीरस (जलमय) हो जाता है, तब हे गोविंद! सबको खाकर अन्त में आप स्वयं ही मुनियों से चिन्तित होकर जल में लेट जाते हैं॥16॥
 
And when the world becomes monotonous (watery), O Govind! After devouring everyone, in the end you yourself, being worried by the wise men, lie down in the water. 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)